About Me

भोपाल, मध्‍यप्रदेश, India
लेखक कला के क्षेत्र में सबसे पहले फिल्‍म टंट्या भील में कार्य किया जिसमें होल्‍कर पुलिस का रोल निभाया, इसके बाद फिल्‍म चक्रब्‍यूह में कार्य किया जिसमें ब्‍यूरोकेट का रोल निभाया एवं फिल्‍म सत्‍याग्रह में अनसनकारी का रोल किया जिसमें अमिताभ बच्‍चन के साथ अनसन पर बैठकर रोल किया।

Tuesday, 24 March 2015

कार्पोरेट कल्चर

कुछ नन्हीं चींटीयां रोज अपने काम पर समय से आती थी और अपना काम अपना काम समय पर करती थी.....

वे जरूरत से ज्यादा काम करके भी खूब खुश थी.......

जंगल के राजा शेर नें एक दिन चींटीयों को काम करते हुए देखा, और आश्चर्यचकित हुआ कि चींटीयां बिना किसी निरीक्षण के काम कर रही थी........

उसने सोचा कि अगर चींटीयां बिना किसी सुपरवाईजर के इतना काम, कर रही थी तो जरूर सुपरवाईजर के साथ वो अधिक काम कर सकती थी.......

उसनें काक्रोच को नियुक्त किया जिसे सुपर्वाईजरी का 10 साल का अनुभव था, और वो रिपोर्टों का बढ़िया अनुसंधान करता था .....

काक्रोच नें आते ही साथ सुबह आने का टाइम, लंच टाईम और जाने का टाईम निर्धारित किया, और अटेंडेंस रजिस्टर बनाया.....

उसनें अपनी रिपोर्टें टाईप करने के लिये, सेकेट्री भी रखी....

उसनें मकड़ी को नियुक्त किया जो सारे फोनों का जवाब देता था और सारे रिकार्डों को मेनटेन करता था......

शेर को काक्रोच की रिपोर्टें पढ़ कर बड़ी खुशी हुई, उसने काक्रोच से कहा कि वो प्रोडक्शन एनालिसिस करे और, बोर्ड मीटिंग में प्रस्तुत करने के लिये ग्राफ बनाए......

इसलिये काक्रोच को नया कम्प्यूटर और लेजर प्रिंटर खरीदना पड़ा.........

और उसनें आई टी डिपार्टमैंट संभालने के लिए मक्खी को नियुक्त किया........

चींटी जो शांति के साथ अपना काम पूरा करना चाहती थी इतनी रिपोर्टों को लिखकर और मीटिंगों से परेशान होने लगी.......

शेर ने सोचा कि अब वक्त आ गया है कि जहां चींटी काम करती है वहां डिपार्टमेंट का अधिकारी नियुक्त किया जाना चाहिये....

उसनें झींगुर को नियुक्त किया, झींगुर ने आते ही साथ अपने आॅफिस के लिये कार्पेट और ए.सी. खरीदा.....

नये बाॅस झींगुर को भी कम्प्यूटर की जरूरत पड़ी और उसे चलाने के लिये वो अपनी पिछली कम्पनी में काम कर रही असिस्टंेट को भी नई कम्पनी में ले आया.........

चींटीयां जहां काम कर रही थी वो दुःख भरी जगह हो गयी जहां सब एक दूसरे पर आदेश चलाते थे और चिल्लाते रहते थें......

झींगुर ने शेर को कुछ समय बाद बताया कि आॅफिस मे टीमवर्क कमजोर हो गया है और माहौल बदलने के लिए कुछ करना चाहिये......

चींटीयों के डिपार्टमेंट की रिव्यू करते वक्त शेर ने देखा कि पहले से उत्पादकता बहुत कम हो गयी थी.......

उत्पादकता बढ़ाने के लिये शेर ने एक प्रसिद्ध कंसलटेंट उल्लू को नियुक्त किया.......

उल्लू नें चींटीयों के विभाग का गहन अघ्ययन तीन महीनों तक किया फिर उसनें अपनी 1200 पेज की रिपोर्ट दी जिसका निष्कर्ष था कि विभाग में बहुत ज्यादा लोग हैं..... जो कम करने की आवश्यकता है......

सोचिये शेर ने नौकरी से किसको निकाला....???
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नन्हीं चींटीयों को..........
क्योंकि उसमें “ नेगेटिव एटीट्यूड, टीमवर्क, और मोटिवेशन की कमी थी.......“
इसे कहते है*** कारपोरेट कल्चर!!

Wednesday, 4 March 2015

हकीकत

जब मध्यप्रदेश से छत्तीसगढ़ अलग हो रहा था तब पदों के बंटवारे की बात सामने आई. तब विभाग के अधिकारियों ने अपने फायदे को देखते हुए उच्च पदों का तो बंटवारा नहीं किया पर मालियों के पद ड्रांईकेडर कर    दिये ओर अपने सारे पद बचा लिये. और जब विभागीय सेटअप बन रहा था तब भी केबल अपने प्रमोशन के लिये पदों का श्रजन कर लिया उस समय भी मालियों के ही पदों में कटोती की गई. इधर दैनिक वेतन भोगी कुछ तो काम करते करते मर गये कुछ को ६२ साल की उमर होने पर रिटायर कर दिया गया. जो बचे हैं उनको भी दैनिक वेतन में ही रिटायर होना है. सभी विभागों ने दैनिक वेतन भोगी के लिये नियमितीकरण के लिये भर्ती मैं कोटा निर्धारित किया और नियमित भी कर दिया है वहीं उद्यान विभाग ने तो उनके लिये पद ही नहीं छोड़े हैं. ये है उद्यान विभाग. ये समझ में नहीं आता कि कूछ समय बाद उद्यान विभाग मैं माली रहेंगे ही नहीं. केवल अधिकारी ही रहेंगे जो कागजों में योजनायें चलायेंगे.

गरीब मजदूरों का खून चूसकर फलता फूलता उद्यान विभाग

भोपाल मध्यप्रदेश की राजधानी बनी तब उद्यान विभाग में नागपुर, रीवा एवं इन्दौर से लगभग १५० परमानेन्ट माली आये थे. उसके बाद स्थानीय स्तर पर क्योंकि राजधानी में मंत्रियों के बंगले, राजभवन एवं प्रमुख सचिव, सचिव एवं अन्य अति विशिष्ठ अधिकारियों के वंगलों के साथ साथ विभाग की नर्सरियों में कर्मचारी कम पड़ते थे अतः दैनिक वेतन भोगी के रूप में मजदूरों को रखा गया जो इन महानुभवों के यहां बगीचे में फल फूल एवं सब्जियां उगाकर इन महानुभावों का पेट भरते थे साथ ही उद्यान विभाग की नर्सरियों में बडिंग ग्राफटिंग एवं रोपड़ के द्वारा सीजनल सब्जियां पुष्प के पौध के साथ साथ आरनामेंटल पोधे एवं गुलाब के अलावा अन्य सुगन्ध एवं पूजा में उपयोग के पुषप के पौधे आज भी उत्पादित करते आ रहे हैं. पहले उद्यान विभाग कृषि विभाग से अटेच था. उद्यान एवं कृषि का मंत्री एव प्रमुख सचिव एक ही होता था. बाद में उद्यान एवं कृषि विभाग अलग हुआ एवं उद्यान विभाग का नाम उद्यानिकी एवं खाद्य प्रसंस्करण रखा गया अब उद्यान विभाग के मंत्री एवं सचिव अलग हो गये. उद्यान विभाग के मजदूरों के साथ विभाग के अधिकारियों द्वारा हमेशा ही सौतेला व्यवहार किया जाता रहा. विभाग के अधिकारी हमेशा इसी उधेड़बुन में रहे की कम मजदूरी में कैसे अधिक काम इन मजदूरों से कराया जाये. जैसे १५० माली जो नियमित थे उनके पद ड्रांईगकेडर कर दिये गये ताकि ज्यादा वेतन की बजाय दैनिक वेतन पर कम वेतन में कार्य कराया जा सके. फिर इसपर भी मन नहीं माना तो वर्ष १९९७ तक जो दैनिक वेतन भोगी कलेक्टर द्वारा निर्धारित दर पर मासिक वेतन पाते थे उन्हें कमिश्नर द्वारा निर्धारित कृषि नियोजन  की साप्ताहिक मजदूरी दी जाने लगी. विरोध करने वाले को काम से ही बंद कर दिया गया. १९८८ के पूर्व के दैवेभो को भी मध्यप्रदेश शासन के वे लाभ जो मिलना चाहिये थे वे आज तक वंचित हैं. वर्ष १९९५ में सहायक संचालक उद्यान प्रमुख उद्यान, भोपाल के कार्यालयीन आदेश क्रमांक/स्था/९/९४-९५/२७३, भोपाल दिनांक १७-०४-९५ के द्वारा १६७ दैनिक वेतन भोगी अर्धकुशल श्रमिक को कुशल श्रमिक की श्रेणी में वर्गीक्रत किया गया तथा १-४-२००१ को २११ कुशल/अर्ध कुशल/ अकुशल कर्मियों की वरिष्ठता शूचि जारी की गई.वर्ष २००२ तक जहां २३५ कर्मचारी दैवेभो एेसे थे जो १९८८ के पूर्व से कार्यरत थे वहीं परलोक को प्यारे होते और शासन के नये आदेश जिसमें दैनिक वेतन भोगी को भी ६० एवं ६२ की आयु में रिटायर करने के नियम बनये गये के अनुसार रिटायर कर देने के उपरांत आज केवल १०० के आसपास दैनिक वेतन भोगी बचे है. यह विडम्वना है कि राज्य शासन के जिस आदेश मे ६० एव ६२ की उम्र मे दैवेभो को रिटायर करने का उल्लेख है उसी की अगली कंडिका में उन्हें गेज्युटी देने का भी उल्लेख किया गया है. यहां राज्य शासन ने उनका ध्यान रखते हुये उनकी कुछ परेशानी दूर की परन्तु उद्यान विभाग ने इस आदेश का कड़ाई से पालन करते हुये १९८८ के पूर्व के दैवेभो को उम्र का मेडीकल वोर्ड से सत्यापन करकर सेवा से पृथक तो कर दिया परन्तु उन्हें उसी आदेश में वर्णित ग्रेज्युटी का लाभ आज तक नहीं दिया जा रहा है.
विभाग के अधिकारियों ने येसा नहीं कि दैनिक वेतन भोगी का ध्यान नहीं रखा या उन्हैं उपकृत नहीं किया वल्कि कुछ अपने अपनों को इन्हीं दैनिक वेतन भोगियों में से निम्न श्रेणी लिपिक तथा कुछ को ग्रामीण उद्यान विस्तार अधिकारी तक बना दिया गया क्योंकि उनकी पहुंच थी या वे अधिकारियों के रिस्तेदार थे या उनने लक्ष्मी मैया का अनुष्ठान किया ये जांच का विषय है. येसा वर्ष २००२ तक चलता रहा. दैनिक वेतन भोगी ने लम्बी लड़ाई के बाद शासन से १०२ पद कार्यभारित माली के स्वीकृत करा लिये थे जिनपर दैनिक वेतन भौगी का वरिष्ठता के आधार पर चयन हुआ पर उनके रिटायर मेंट के बाद कुछ को उन पदों पर नियमित भी किया गया परन्तु विभागीय अधिकारियों ने उन पदों को भी ड्रांईगकेडर कर समाप्त कर दिया. १०२ जिसमे १ ट्रेक्टर चालक, ४ चौकीदार एवं वाकी माली के पद थे वे सब रिटायर होते गये और पद समाप्त होते गये. आज की स्थिति में केवल ३२ कार्यभारित माली बचे हैं उनके साथ भी कुठराघात हुआ. विभाग का नवीन सेटअप तैयार करते समय विभाग के अधिकारी ये भूल गये कि भोपाल जिले मे कार्यभारित कार्यरत हैं सेटअप में उनके लिये शासन से पदों की मांग करना है. जब सेटप जारी हो गया तो उनके वेतन का संकट खड़ा हो गया. पद ही नहीं तो वेतन कहां से निकाला जाये. उन्हैं ६ माह तक वेतन के विना ही कार्य करना पडा़ वडे मुस्किल से शासन ने ३ वर्ष के लिये उनका वेतन निकालने की परमीशन दी है वह अवधी भी समाप्त होने वाली है. अब क्या होगा इन कर्मचारियों का.
विभागीय अधिकारी शासन के साथ साथ विधानसभा को भी गलत जानकारी देते रहते हैं जैसे कि एक बार एक प्रश्न के उत्तर में २३५ दैनिक वेतन भोगी श्रमिक का १९८८ से पूर्व से कार्यरत होना स्वीकार किया वहीं दुसरी बार कोई दैनिक वेतन भोगी कार्यरत नहीं है बता दिया.