लेखक एक भारत का आम नागरिक है जिसने कई मंत्री के निजी स्टाफ में काम किया है तथा वर्तमान में भी मध्यप्रदेश के राज्यमंत्री के निजी स्टाफ में कार्यरत है।
About Me
- Dinesh Kumar Dubey
- भोपाल, मध्यप्रदेश, India
- लेखक कला के क्षेत्र में सबसे पहले फिल्म टंट्या भील में कार्य किया जिसमें होल्कर पुलिस का रोल निभाया, इसके बाद फिल्म चक्रब्यूह में कार्य किया जिसमें ब्यूरोकेट का रोल निभाया एवं फिल्म सत्याग्रह में अनसनकारी का रोल किया जिसमें अमिताभ बच्चन के साथ अनसन पर बैठकर रोल किया।
Sunday, 12 August 2018
Thursday, 1 February 2018
डर लगता कुछ कहने में
मियां आप तो रहने दें,
आपके वश का काम नहीं
मूंछ मुंडायें चूड़ी पहनें
जो डर लगता कुछ कहने में
बोल बिकाऊ लगते हैं
लेख़ कमाऊ लगते हैं
हम तो मर मर कर जी लेंगे
हम को सबकुछ सहने दें
अपने बच्चों को तुम पालो
हम भी बच्चे पाल रहे
बाहुवली से डर कर रहना
महावली को रहने दें
दिनेश दुबे 9229547354
Wednesday, 16 August 2017
तपती गर्मी में छांव सी मां....
तपती गर्मी में छाँव सी माँ
रिसते जख्मों पर दवाओं सी माँ
नन्हें पैरों की जुराबों सी माँ
ऊनी टोपी सी दुआओं सी माँ
परियों की कहानी-कथाओं सी माँ
आशीषों सी माँ और सुझावों सी माँ
समरसता की मूरत पर झुकाव सी माँ
मिटटी के खिलोने, कागज़ की नाव सी माँ
ममता के आँगन में हारी सी माँ
कभी नहीं थकती ये प्यारी सी माँ
बच्चे की चोटों पर सहमी सी माँ
पीर-फकीरों पर रहमी सी माँ
आँगन के झूले और पलने सी मां
Wednesday, 9 August 2017
फिजूल है मोदी या शाह को कोसना
क्या नरेन्द्र मोदी और अमित शाह भाजपा में तानाशाह की भूमिका में हैं? जिन सिद्धांतों पर लड़ाई लड़ने के लिए भाजपा का जन्म हुआ था, क्या वो रास्ता यह पार्टी छोड़ चुकी है। और आज की भाजपा में कार्यकर्ता तो दूर मंत्रियों की भी आवाज नहीं निकलती। ये कुछ प्रतिक्रियाएं हैं जो सोमवार के फर्स्ट कालम, भाजपा का यह मौजूदा दौर कब तक...पर सामने आईं हैं। सत्ता की अपनी स्वाभाविक बुराईयां होती है। जाहिर है हर जगह तो भाजपा इससे अछूत हो नहीं सकती।
दूसरा भाजपा अगर अपने आपको लचीला नहीं बनाती तो उसका यह मौजूदा दौर भी कोसों दूर होता है। और भाजपा ने यह राजनीति कोई नरेन्द्र मोदी या अमित शाह के राष्ट्रीय स्तर पर हुए प्रादुर्भाव के बाद तो सीख नहीं ली। लंबा समय लगा है, भाजपा को राजनीति सीखने के लिए। जाहिर है राजनीति के दांवपेंच भी आप उससे ही तो सीखेेंगे जो सत्ता में मौजूद है। तो इसमें शक नहीं कि कांग्रेस से विरोध के बावजूद भी भाजपा ने सीखा तो सबकुछ कांग्रेस से ही है। इसका दर्द भाजपा में दो तरह के लोगों को हो सकता है। एक जिनकी सत्ता में उपेक्षा हो रही है और दूसरे वे जो खांटी टाईप के जनसंघी मानसिकता के कार्यकर्ता हैं।
दलबदल, जनप्रतिनिधियों की खरीद फरोख्त, राज्यों की सरकारों को गिराना, बनाना, बर्खास्त करना क्या यह सिर्फ पिछले तीन सालों की कहानी है। सीबीआई सहित तमाम जांच एजेंसियों के दुरूपयोग के मामले क्या इस देश में नए हैं? वैसे भी एक स्थापित तथ्य है कि राज करने में नीति कहीं नहीं होती। गवर्नेंस की नीति तो हो सकती है। लेकिन राजनीति के साथ तो साम-दाम-दंड-भेद शास्वत रूप से जुडेÞ हैं। तो भाजपा जो कर रही है, उसके लिए मोदी या शाह को कोसना फिजूल है।
सोमवार को ही पूर्वोत्तर के त्रिपुरा में तृणमूल कांग्रेस से निष्कासित छह विधायक भाजपा में शामिल हो गए और कम्युनिस्टों के इस राज्य में भाजपा ने विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल का दर्जा हासिल कर लिया। त्रिपुरा में भाजपा का कोई नामलेवा भी नहीं है। लेकिन अपने संगठन कौशल में निपुण भाजपा को आखिर पैर रखने का मौका तो मिला या नहीं। आज उत्तरपूर्व में देख लें, असम जैसे बड़े राज्य सहित मणिपुर में भी उसकी सत्ता है और इसलिए सेवन सिस्टर्स में उसका दखल हर कहीं थोड़ा बहुत तो हो ही गया है।
रही बात नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के तानाशाह होने की तो मध्यप्रदेश पर ही गौर कर लीजिए। नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बने तीन साल पूरे हो गए लेकिन क्या वे शिवराज सिंह चौहान का बाल भी बांका कर पाएं। मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही इन चर्चाओं ने कई बार जोर पकड़ा कि शिवराज अब गए, तब गए। मोदी जितनी बार भी प्रधानमंत्री बनने के बाद मध्यप्रदेश आए, उनकी बाडी लेंग्वेज ने कभी भी यह नहीं दर्शाया कि वे शिवराज सिंह चौहान से खुश हैं।
मोदी की प्रशासनिक क्षमताएं और पकड़, काम करने की उनकी अपनी शैली हो सकता है कि लोगों को उनमें एक दृढ़ शासक का आभास कराती हो। यह भी एक तथ्य है कि इस समय पीएमओ की जैसी कार्यशैली है, शायद वो पहले के प्रधानमंत्रियों के बिल्कुल विपरीत है। कांग्रेस के भ्रष्टाचार को सामने रखकर मोदी ने देश की जनता को अपने ईमानदार होने का भरोसा दिलाया था। इसलिए मोदी अगर अपने मंत्रियों और अफसरों पर सख्त हो तो इसमें बुराई भी क्या है? लोगों में यह भरोसा तो बैठा है कि मोदी ईमानदार हैं।
अब मोदी से ठीक उलट मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के 12 साल के शासन को देख लो। रोज कहने सुनने में आता है कि इस मुख्यमंत्री की प्रशासनिक पकड़ नहीं है। या मध्यप्रदेश में तो सरकार को अफसर ही चला रहे हैं। वो भी कुछ इने गिने। बावजूद इसके मोदी और अमित शाह के तीन साल के कार्यकाल में मध्यप्रदेश में पत्ता भी नहीं खड़क रहा। इसकी अभी भी कोई गारंटी नहीं है कि 2018 के विधानसभा चुनाव के पहले मध्यप्रदेश में कोई नेतृत्व परिवर्तन होगा या नहीं। हां, इस बात की गारंटी हो सकती है कि मुख्यमंत्री रहते हुए भी शिवराज अगले चुनाव का वैसा चेहरा नहीं होंगे जैसा 2008 या 2013 में था।
तय है कि मध्यप्रदेश में अगला विधानसभा चुनाव मोदी और शाह की जोड़ी ही लड़ेगी। 2019 जिनका लक्ष्य हो, वो 29 लोकसभा सीटों पर रिस्क कैसे ले सकते हैं? इसलिए 2018 में भी मध्यप्रदेश में जीतेंगे तो मोदी-शाह और हारेंगी तो शिवराज की एंटी इनकंबेंसी। तब तक शिवराज भले ही रहें या जाएं।
लेकिन बात अगर पार्टी में भी तानाशाही की होती तो क्या शिवराज का बने रहना संभव था? इसलिए मान लेना चाहिए कि शिवराज को बनाए रखने या हटाने का अकेला फैसला मोदी और शाह के हाथ में नहीं है। बिना आरएसएस को भरोसे में लिए भाजपा में कोई भी नेतृत्व एकतरफा फैसले नहीं ले सकता है। सरकार या भाजपा के रोज के कामों में संघ का भले ही हस्तक्षेप नहीं हो लेकिन महत्वपूर्ण फैसलों में तो होता है। संघ, संगठन से छेड़छाड़ किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं कर सकता है। उमा भारती ने किया था, सभी ने उनका हश्र देखा। लेकिन क्योंकि नरेन्द्र मोदी संघ के प्रचारक रह चुके हैं इसलिए उनसे ऐसी किसी गलती की उम्मीद करना बेमानी है।
Wednesday, 12 July 2017
Friday, 5 May 2017
पैतरे पर पैतरे
Thursday, 27 April 2017
High Court Order
प्रतिलिपि, नियमों के अनुसार
(सुबोध अभयनकर)
न्यायाधीश
Tuesday, 11 April 2017
आरक्षण
आज हम उस गलती की सजा काट रहे हैं जो हमने की ही नहीं । जिसका कारण है आरक्षण व्यवस्था। और ये नेताओं के निजी लाभ के लिए बनाई गई व्यवस्था है। आज हमारा योग्य युवा विदेशों में जा रहा है। और अयोग्य शासकीय नोकरी में।
नोकरी में आरक्षण , पदोन्नति में आरक्षण।
आरक्षण के द्वारा हिंदुओं को ही विभाजित किया जा रहा है फिर उनसे एक होकर रहने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं।
पहले समान नागरिक अचार संहिता की बात की जाए फिर राम मंदिर की बात की जाए और उसके बाद तीन तलाक की बात की जाए।
क्योंकि आजादी के बाद आरक्षण पाए लोग रिटायर हो चुके हैं 60 साल हो चुके हैं अब आरक्षण की जरूरत नहीं है। 60 साल हमने भी वही दुख झेला है ।
अब हमारे बच्चों की क्या गलती है?
Friday, 3 March 2017
दैनिक वेतन भोगी या बनिये के नोकर
मध्यप्रदेश शासन जबकि दैनिक वेतन भोगी श्रमिकों एवं गैंगमेनों को स्थाई कर्मी में विनियमितीकरण करने के स्पष्ट आदेश जारी कर चुका है एवं संचालक उद्यानिकी एवं प्रक्षेत्र वानिकी ने भी उक्त आदेश को संलग्न कर अपना कवरिंग लेटर लगाकर समस्त जिलाें के उप/सहायक संचालक एवं प्रमुख उद्यानों के सहायक संचालक को स्पष्ट निर्देश दिये हैं कि शासन के आदेश पर नियमानुसार कार्यवाही करें फिर भी सहायक संचालक उद्यान प्रमुख उद्यान के प्रभारी कोई कार्यवाही करने से पहले संचालक से कनिष्ठ अधिकारियेां से पूछ रहे हैं कि कैसे क्या करना है।
30 वर्ष विभाग की सेवा कर के जो दैनिक वेतन भोगी रिटायर्ड हो गये हैं उन्हें उपादान की राशि का भुगतान करने के शासन के स्पष्ट निर्देश होने के बाद भी सहायक संचालक उद्यान प्रमुख उद्यान द्वारा उपादान राशि का भुगतान करने में कोर्ट के आदेश को भी मानने को तैयार नहीं हैं। कोर्ट ने 7 रिटायर्ड दैनिक वेतन भाेगी कर्मचारियों को उपादान राशि लगभग 15.00 लाख का भुगतान करने के निर्देश दिये हैं। 120 दिन व्यतीत हो जाने के बाद भी न तो विभाग द्वारा अपील की गई न ही भुगतान किया गया।
अब एक नया बहाना बनाया जा रहा है कि भोपाल में प्रमुख उद्यान में तो दैनिक वेतन भोगी को रोज रखा एवं रोज निकाला जाता है अत: ये उपादान के हकदान नहीं हैं। मैं ये पूछना चाहता हूं कि जब रोज रखा जाता एवं रोज निकाला जाता है तो इन दैनिक वेतन भोगी को लगभग 30 वर्ष सेवा काल में एक भी बार क्यों नहीं निकाला गया। अब जब वे उपादान राशि की मांग कर रहे हैं तो ये बहाना क्यों बनाया जा रहा है कि रोज रखते और रोज निकालते हैं। लगभग 400 दैनिक वेतनभोगी पिछले 40 साल से लगातार क्यों काम कर रहे हैं. जब इतने आदमी की लगातार आवश्यकता रहती है तो शासन के इसकी मंजूरी क्यों नहीं ली गई। क्या इनके बिना मुख्यमंत्री निवास उद्यान, राजभवन उद्यान, एवं भोपाल की 6 नर्सरी एवं आई ए एस के घरों पर स्थित उद्यानों का रखरखाव संभव है।
विभाग में संचालक पद पर पिछले कई वर्ष से कोई आई ए एस या आई एफ एस की पदस्थापना शाासन करता आया है जो कुछ समय के लिये आता है जब तक वो विभाग के बारे में समझता है तब तक उसे हटाकर किसी दूसरे काे बैठा दिया जाता है। विभागीय वरिष्ठ अधिकारी को संचालक के पद पर पदस्थ नहीं किया जाता है जिससे वे हतोत्साहित होकर विभाग के विरूद्ध निर्णय लेकर विभाग को डुबाने में लगे हैं। एवं संचालक की चापलूसी कर संचालक को भी सही स्थिति से अवगत नहीं कराकर उसे भी भृमित करते रहते हैं।
शासन स्तर से जो निर्देश जारी हो चुकेे हैं उन्हें समझने की कोशिस न करते हुऐ शासन को हीे बार बार पत्र लिखकर मत मांगा जाता है। शासन ने भी कई बार पत्र जारी कर विभागीय स्तर से कार्यवाही करने के निर्देश दिये हैं परन्तु विभाग के अधिकारी अपनी हरकतों से बाज नहीं आते हैं बार बार शासन को परेशान करते हैं और कर्मचारी को उलझाते रहते हैं।
Monday, 6 February 2017
कृषि श्रमिक बनाम दैनिक वेतन भोगी
उद्यानिकी विभाग का नाम पहले उद्यानिकी एवं प्रक्षेत्र वानिकी था जिसे बदलकर उद्यानिकी एवं खाद्य प्रसंस्करण कर दिया गया है। जैसा कि नाम से ही प्रतीत होता है कि विभाग में कोई फसल कटाई का कार्य नहीं होता है अत: विभाग में कृषि श्रमिक का कोई काम नहीं होना चाहिए।
परन्तु अधिकारियों की मनमानी एवं तानाशाही के चलते वर्ष 1997 में तत्कालीन संचालक ने मजदूरी का खर्चा कम करने के उददेश्य से विभाग में वर्ष 1988 के बाद से कार्यरत दैनिक वेतन भोगी माली कर्मचारी को पहले तो नौकरी से निकाल दिया जब कार्य प्रभावित होने लगा तो उन्हें जो पूर्व में मासिक जिलाध्यक्ष की दर पर कार्यरत थे, साप्ताहिक कृषि श्रमिक की दर पर बापस रख लिया। बेचारे नौकरी जाने के डर से कम पैसे में कार्य करने को मजबूर हो गये। इन्हें सप्ताह में 6 दिन का वेतन देकर पूरे 7 दिन कार्य कराया जाता रहा अर्थात माह में इन्हें केवल 26 दिन की ही मजदूरी मिलती रही एवं कोई शासकीय अवकाश की पात्रता भी नहीं रखी। इन्हें कभी भी कार्य से बंद कर नये लोगों को भर्ती कर लिया जाता रहा।
अधिकारियों को वर्ष 1988 के बाद के मजदूरों को फिर से रखने के लिये इसलिये मजबूर होना पडा क्योंकि भोपाल में ये मजदूर श्रमिक माननीय मुख्यमंत्री निवास उद्यान, राजभवन उद्यान, समस्त मंत्री निवास उद्यानों एवं आईएएस और आईपीएस के साथ साथ विभागीय अधिकारियों के घरों में भी घर के बगीचे में साग-भाजी उगाने से लेकर उनके घर के झाडू-पौंछा और चौका-बरतन तक करते हैं।
Saturday, 28 January 2017
न्यूनतम वेतन अधिनियम 1948
Saturday, 21 January 2017
पिताजी आप पिटे सो पिटे हम सब को क्यों पिटवाया
परिवार में पिता माता पुत्र पुत्री चार लोग थे।
उनके सामने एक गुंडा टाईप का आदमी बैठा था।
गुंडे ने उस परिवार की लडकी को छेड. दिया।
पिता ने गुंडे से कहा कि तुम अपने आप काे क्या समझते हो
मैं तुम्हें अगले स्टेशन पर देखता हूँ। पुलिस बुलाकर तुम्हें अंदर करवा दूंगा।
इतने में गुंडे ने पिताजी को एक थप्पड रशीद कर दिया।
फिर पिता बोला कि अच्छा तुम्हारी हिम्मत
तुमने मुझे थ्प्पड मारा
मुझे मारा सो मारा मेरी बीबी को मत मार देना
नहीं तो मैं बहूत बुरा आदमी हॅूं
अभी तुम मुझे जानते नहीं हो
इतने में गुंडे ने उसकी बीबी को भी एक थ्प्पड रशीद कर दिया
पिता बोला अच्छा तुम्हारी इतनी हिम्मत
पता नहीं तुम्हें मैं क्या समझकर छोड रहा हूं।
पर मैं तुम्हें अगले स्टेशन पर बताउंगा कि मैं क्या हूँ
तुम्हारी गुण्डई निकल जायेगी यदि तुमने मेरे बेटे काे मारा
फिर गुण्डे ने बेटे काे भी एक थ्प्पड मार दिया
फिर पिता बोला यदि तुमने मेरी बेटी को मार दिया तो मैं तुम्हारा
यहीं मडर कर दूंगा।
इस पर गुंडे ने उसकी बेटी को भी एक थप्पड जड दिया
इसके बाद वे सब शांत बैठ गये
गुंडा अगले स्टेशन पर उतर का चला गया
यह परिवार भी अपने घर पहुंचा
घर पर बेटे ने पिताजी से पूछा कि
आप तो पिटे सो पिटे
हम सब को क्यों पिटवाया
इस पर पिताजी ने जवाब दिया
यदि मैं तुम सब को नहीं पिटवाता तो तुम सब
घर पर आकर मुझे चिढाते कि
क्यों पिताजी कैसे पिटे
मजा आया;;;;

