About Me

भोपाल, मध्‍यप्रदेश, India
लेखक कला के क्षेत्र में सबसे पहले फिल्‍म टंट्या भील में कार्य किया जिसमें होल्‍कर पुलिस का रोल निभाया, इसके बाद फिल्‍म चक्रब्‍यूह में कार्य किया जिसमें ब्‍यूरोकेट का रोल निभाया एवं फिल्‍म सत्‍याग्रह में अनसनकारी का रोल किया जिसमें अमिताभ बच्‍चन के साथ अनसन पर बैठकर रोल किया।

Tuesday, 24 March 2015

कार्पोरेट कल्चर

कुछ नन्हीं चींटीयां रोज अपने काम पर समय से आती थी और अपना काम अपना काम समय पर करती थी.....

वे जरूरत से ज्यादा काम करके भी खूब खुश थी.......

जंगल के राजा शेर नें एक दिन चींटीयों को काम करते हुए देखा, और आश्चर्यचकित हुआ कि चींटीयां बिना किसी निरीक्षण के काम कर रही थी........

उसने सोचा कि अगर चींटीयां बिना किसी सुपरवाईजर के इतना काम, कर रही थी तो जरूर सुपरवाईजर के साथ वो अधिक काम कर सकती थी.......

उसनें काक्रोच को नियुक्त किया जिसे सुपर्वाईजरी का 10 साल का अनुभव था, और वो रिपोर्टों का बढ़िया अनुसंधान करता था .....

काक्रोच नें आते ही साथ सुबह आने का टाइम, लंच टाईम और जाने का टाईम निर्धारित किया, और अटेंडेंस रजिस्टर बनाया.....

उसनें अपनी रिपोर्टें टाईप करने के लिये, सेकेट्री भी रखी....

उसनें मकड़ी को नियुक्त किया जो सारे फोनों का जवाब देता था और सारे रिकार्डों को मेनटेन करता था......

शेर को काक्रोच की रिपोर्टें पढ़ कर बड़ी खुशी हुई, उसने काक्रोच से कहा कि वो प्रोडक्शन एनालिसिस करे और, बोर्ड मीटिंग में प्रस्तुत करने के लिये ग्राफ बनाए......

इसलिये काक्रोच को नया कम्प्यूटर और लेजर प्रिंटर खरीदना पड़ा.........

और उसनें आई टी डिपार्टमैंट संभालने के लिए मक्खी को नियुक्त किया........

चींटी जो शांति के साथ अपना काम पूरा करना चाहती थी इतनी रिपोर्टों को लिखकर और मीटिंगों से परेशान होने लगी.......

शेर ने सोचा कि अब वक्त आ गया है कि जहां चींटी काम करती है वहां डिपार्टमेंट का अधिकारी नियुक्त किया जाना चाहिये....

उसनें झींगुर को नियुक्त किया, झींगुर ने आते ही साथ अपने आॅफिस के लिये कार्पेट और ए.सी. खरीदा.....

नये बाॅस झींगुर को भी कम्प्यूटर की जरूरत पड़ी और उसे चलाने के लिये वो अपनी पिछली कम्पनी में काम कर रही असिस्टंेट को भी नई कम्पनी में ले आया.........

चींटीयां जहां काम कर रही थी वो दुःख भरी जगह हो गयी जहां सब एक दूसरे पर आदेश चलाते थे और चिल्लाते रहते थें......

झींगुर ने शेर को कुछ समय बाद बताया कि आॅफिस मे टीमवर्क कमजोर हो गया है और माहौल बदलने के लिए कुछ करना चाहिये......

चींटीयों के डिपार्टमेंट की रिव्यू करते वक्त शेर ने देखा कि पहले से उत्पादकता बहुत कम हो गयी थी.......

उत्पादकता बढ़ाने के लिये शेर ने एक प्रसिद्ध कंसलटेंट उल्लू को नियुक्त किया.......

उल्लू नें चींटीयों के विभाग का गहन अघ्ययन तीन महीनों तक किया फिर उसनें अपनी 1200 पेज की रिपोर्ट दी जिसका निष्कर्ष था कि विभाग में बहुत ज्यादा लोग हैं..... जो कम करने की आवश्यकता है......

सोचिये शेर ने नौकरी से किसको निकाला....???
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
नन्हीं चींटीयों को..........
क्योंकि उसमें “ नेगेटिव एटीट्यूड, टीमवर्क, और मोटिवेशन की कमी थी.......“
इसे कहते है*** कारपोरेट कल्चर!!

Wednesday, 4 March 2015

हकीकत

जब मध्यप्रदेश से छत्तीसगढ़ अलग हो रहा था तब पदों के बंटवारे की बात सामने आई. तब विभाग के अधिकारियों ने अपने फायदे को देखते हुए उच्च पदों का तो बंटवारा नहीं किया पर मालियों के पद ड्रांईकेडर कर    दिये ओर अपने सारे पद बचा लिये. और जब विभागीय सेटअप बन रहा था तब भी केबल अपने प्रमोशन के लिये पदों का श्रजन कर लिया उस समय भी मालियों के ही पदों में कटोती की गई. इधर दैनिक वेतन भोगी कुछ तो काम करते करते मर गये कुछ को ६२ साल की उमर होने पर रिटायर कर दिया गया. जो बचे हैं उनको भी दैनिक वेतन में ही रिटायर होना है. सभी विभागों ने दैनिक वेतन भोगी के लिये नियमितीकरण के लिये भर्ती मैं कोटा निर्धारित किया और नियमित भी कर दिया है वहीं उद्यान विभाग ने तो उनके लिये पद ही नहीं छोड़े हैं. ये है उद्यान विभाग. ये समझ में नहीं आता कि कूछ समय बाद उद्यान विभाग मैं माली रहेंगे ही नहीं. केवल अधिकारी ही रहेंगे जो कागजों में योजनायें चलायेंगे.

गरीब मजदूरों का खून चूसकर फलता फूलता उद्यान विभाग

भोपाल मध्यप्रदेश की राजधानी बनी तब उद्यान विभाग में नागपुर, रीवा एवं इन्दौर से लगभग १५० परमानेन्ट माली आये थे. उसके बाद स्थानीय स्तर पर क्योंकि राजधानी में मंत्रियों के बंगले, राजभवन एवं प्रमुख सचिव, सचिव एवं अन्य अति विशिष्ठ अधिकारियों के वंगलों के साथ साथ विभाग की नर्सरियों में कर्मचारी कम पड़ते थे अतः दैनिक वेतन भोगी के रूप में मजदूरों को रखा गया जो इन महानुभवों के यहां बगीचे में फल फूल एवं सब्जियां उगाकर इन महानुभावों का पेट भरते थे साथ ही उद्यान विभाग की नर्सरियों में बडिंग ग्राफटिंग एवं रोपड़ के द्वारा सीजनल सब्जियां पुष्प के पौध के साथ साथ आरनामेंटल पोधे एवं गुलाब के अलावा अन्य सुगन्ध एवं पूजा में उपयोग के पुषप के पौधे आज भी उत्पादित करते आ रहे हैं. पहले उद्यान विभाग कृषि विभाग से अटेच था. उद्यान एवं कृषि का मंत्री एव प्रमुख सचिव एक ही होता था. बाद में उद्यान एवं कृषि विभाग अलग हुआ एवं उद्यान विभाग का नाम उद्यानिकी एवं खाद्य प्रसंस्करण रखा गया अब उद्यान विभाग के मंत्री एवं सचिव अलग हो गये. उद्यान विभाग के मजदूरों के साथ विभाग के अधिकारियों द्वारा हमेशा ही सौतेला व्यवहार किया जाता रहा. विभाग के अधिकारी हमेशा इसी उधेड़बुन में रहे की कम मजदूरी में कैसे अधिक काम इन मजदूरों से कराया जाये. जैसे १५० माली जो नियमित थे उनके पद ड्रांईगकेडर कर दिये गये ताकि ज्यादा वेतन की बजाय दैनिक वेतन पर कम वेतन में कार्य कराया जा सके. फिर इसपर भी मन नहीं माना तो वर्ष १९९७ तक जो दैनिक वेतन भोगी कलेक्टर द्वारा निर्धारित दर पर मासिक वेतन पाते थे उन्हें कमिश्नर द्वारा निर्धारित कृषि नियोजन  की साप्ताहिक मजदूरी दी जाने लगी. विरोध करने वाले को काम से ही बंद कर दिया गया. १९८८ के पूर्व के दैवेभो को भी मध्यप्रदेश शासन के वे लाभ जो मिलना चाहिये थे वे आज तक वंचित हैं. वर्ष १९९५ में सहायक संचालक उद्यान प्रमुख उद्यान, भोपाल के कार्यालयीन आदेश क्रमांक/स्था/९/९४-९५/२७३, भोपाल दिनांक १७-०४-९५ के द्वारा १६७ दैनिक वेतन भोगी अर्धकुशल श्रमिक को कुशल श्रमिक की श्रेणी में वर्गीक्रत किया गया तथा १-४-२००१ को २११ कुशल/अर्ध कुशल/ अकुशल कर्मियों की वरिष्ठता शूचि जारी की गई.वर्ष २००२ तक जहां २३५ कर्मचारी दैवेभो एेसे थे जो १९८८ के पूर्व से कार्यरत थे वहीं परलोक को प्यारे होते और शासन के नये आदेश जिसमें दैनिक वेतन भोगी को भी ६० एवं ६२ की आयु में रिटायर करने के नियम बनये गये के अनुसार रिटायर कर देने के उपरांत आज केवल १०० के आसपास दैनिक वेतन भोगी बचे है. यह विडम्वना है कि राज्य शासन के जिस आदेश मे ६० एव ६२ की उम्र मे दैवेभो को रिटायर करने का उल्लेख है उसी की अगली कंडिका में उन्हें गेज्युटी देने का भी उल्लेख किया गया है. यहां राज्य शासन ने उनका ध्यान रखते हुये उनकी कुछ परेशानी दूर की परन्तु उद्यान विभाग ने इस आदेश का कड़ाई से पालन करते हुये १९८८ के पूर्व के दैवेभो को उम्र का मेडीकल वोर्ड से सत्यापन करकर सेवा से पृथक तो कर दिया परन्तु उन्हें उसी आदेश में वर्णित ग्रेज्युटी का लाभ आज तक नहीं दिया जा रहा है.
विभाग के अधिकारियों ने येसा नहीं कि दैनिक वेतन भोगी का ध्यान नहीं रखा या उन्हैं उपकृत नहीं किया वल्कि कुछ अपने अपनों को इन्हीं दैनिक वेतन भोगियों में से निम्न श्रेणी लिपिक तथा कुछ को ग्रामीण उद्यान विस्तार अधिकारी तक बना दिया गया क्योंकि उनकी पहुंच थी या वे अधिकारियों के रिस्तेदार थे या उनने लक्ष्मी मैया का अनुष्ठान किया ये जांच का विषय है. येसा वर्ष २००२ तक चलता रहा. दैनिक वेतन भोगी ने लम्बी लड़ाई के बाद शासन से १०२ पद कार्यभारित माली के स्वीकृत करा लिये थे जिनपर दैनिक वेतन भौगी का वरिष्ठता के आधार पर चयन हुआ पर उनके रिटायर मेंट के बाद कुछ को उन पदों पर नियमित भी किया गया परन्तु विभागीय अधिकारियों ने उन पदों को भी ड्रांईगकेडर कर समाप्त कर दिया. १०२ जिसमे १ ट्रेक्टर चालक, ४ चौकीदार एवं वाकी माली के पद थे वे सब रिटायर होते गये और पद समाप्त होते गये. आज की स्थिति में केवल ३२ कार्यभारित माली बचे हैं उनके साथ भी कुठराघात हुआ. विभाग का नवीन सेटअप तैयार करते समय विभाग के अधिकारी ये भूल गये कि भोपाल जिले मे कार्यभारित कार्यरत हैं सेटअप में उनके लिये शासन से पदों की मांग करना है. जब सेटप जारी हो गया तो उनके वेतन का संकट खड़ा हो गया. पद ही नहीं तो वेतन कहां से निकाला जाये. उन्हैं ६ माह तक वेतन के विना ही कार्य करना पडा़ वडे मुस्किल से शासन ने ३ वर्ष के लिये उनका वेतन निकालने की परमीशन दी है वह अवधी भी समाप्त होने वाली है. अब क्या होगा इन कर्मचारियों का.
विभागीय अधिकारी शासन के साथ साथ विधानसभा को भी गलत जानकारी देते रहते हैं जैसे कि एक बार एक प्रश्न के उत्तर में २३५ दैनिक वेतन भोगी श्रमिक का १९८८ से पूर्व से कार्यरत होना स्वीकार किया वहीं दुसरी बार कोई दैनिक वेतन भोगी कार्यरत नहीं है बता दिया.

Saturday, 21 February 2015

स्वयंवर

क्या सीता के स्वयंवर के समय जाति बंधन था. यदि कोई भील जाति का आदमी धनूष तोड़ देता तो क्या राजा जनक विवाह करने से मना कर सकते थे. जाति बंधन स्वयंवर पर लागू नहीं होता. आज हम अरेन्ज मैरिज के रूप में झूठी शानोसौकत दिखा कर समाज में बुराई पैदा कर रहे हैं.
दहेज प्रथा, जातिवाद, समाजवाद, आदी भारत में बड़ी समस्या रही हैं. हालांकि अरेंज मैरिज कोई खराब व्यवस्था नहीं है परन्तू अपनी झूठी शान की खातिर लड़के या लड़की की पसंद की शादी में अडंगा डलना भावना को न समझना केवल हम ही सही हैं ऐसा समझना बहूत ही बूरी बात है.
अरेंज मेरिज का पता चलते ही लड़का या लड़की के माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी, बूआ-फूफा, मोसा-मोसी सभी रिस्तेदार तैयारी में जूट जाते हैं. सभी सहयोग करने को तैयार रहते हैं किसे क्या गिफ्ट देना है ओर उनके यहां शादी में क्या व्यवहार आया था उसके हिसाब से सभी मदद करते हैं. पर अरैंज मैरिज हमेशा सफल होती हैं ऐसा जरूरी तो नहीं है. और लव मैरिज भी हमेशा सफल हो ऐसा भी कोई दावा नहीं कर सकता है. हां लव मेरिज में ये बूराई जरूर है कि रिस्तेदारों और सगे संबंधियों को ये बहाना मिल जाता है कि उनकी मर्जी से तो शादी की नहीं वे मदद क्यों करें. यदि शादी का डिसीजन लड़का और लड़की ने ही लिया है तो आगे भी सारे डिसीजन उन्हें स्वयं ही लेना पडेंगे.
मैरी स्थिति कूछ ऐसी हो गई जैसी सांप और छछूंदर की होती है जब मूझे मेरी बिटिया जो पेशे से ब्यूटीशियन है, ने अपना डिसीजन सूनाया कि उसे शादी उसकी मर्जी से करना है और किससे करना है उसे उसने देख परख लिया है.
मैंने भी यह बात किसी से छिपाना ठीक नहीं समझा. सारे सगे संबंधियों को बता दी. विरोध तो होना ही था.
पिताजी ने कह दिया कि " देहरी नहीं चढ़ पाओगे"
ससूर साहब ने कह दिया " कूछ भी करना पड़े......ये शादी नहीं हो सकती.." किसी ने भी स्थिति जानने की कोशिस नहीं की.
आज मैं भी लड़की का साथ न दूं तो क्या होगा. वह भाग कर शादी कर ले. तब बदनामी नहीं होगी?
आगे उसके भाईयों की शादी में दिक्कत जरूर आयेगी परन्तू जब तक वे अपने पैरों पर खड़े नहीं होंगे उनकी शादी भी करना आज की स्थिति में ठीक नहीं है. आज मूझे सहारा श्री की वो बात याद आती है..."कोई किसी के लिये कूछ नहीं करता, जो भी करता है, अपने लिये करता है "
समाज मैं महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने का क्या मतलब है यदि हम उनकी भावनाऔं को रौंधते हूए बिना उनकी मर्जी के सारे निर्णय उनपर थोपते रहेंगे.

Thursday, 12 February 2015

नजदीकियां

जितना करीबी जो था, उसपर उतना ऐतवार करते थे.
वफा की जूस्तजू थी उनसे, उन्हीं का दम्भ भरते थे.
मगर जब आफत बड़ी आई, तब हमने था ये जाना.
ईश्वर आकाश में नहीं, ईश्वर तो धरती में बसते थे.
माना की उम्मीद पर ही ये सारी दूनियां कायम है.
उम्मीद पर हर लम्हे का

Sunday, 11 January 2015

गूलाब

शाख से तोड़कर बोतल में लगाने वालों
गर्दनें काटकर पानी तो पिलाने वालों
खूसबूयें और शवाब मैं तूम्हारी महफिल में,
बिखेरता रहूं महफिल को सजाने वालों.

एक माली ने मेरा पूरा खयाल किया,
खाद मिट्टी कीटनाशक का इस्तेमाल किया,
जब में हस्टपूस्ट हूआ और इठलाया,
अपनी महफिल के लिये तूने मूझे हलाल किया.

Sunday, 4 January 2015

व्हाट्सएप के उपयोग मे सावधानियां

व्हॉट्सएप दुनिया की सबसे लोकप्रिय और उपयोगी मोबाइल मैसेज एप्लीकेशन है. लेकिन इसके इस्तेमाल के दौरान एक स्तर पर आप हमेशा इसके साइड इफेक्टस से लड़ते रहते हैं और कई बार यह मशीनी ऐप आपसे जीत जाती है. अब इसकी लत ऐसी है कि छोड़ नहीं सकते, पर कुछ दिक्कतें ऐसी हैं कि मन खिन्न हो जाता है. इसीलिए हम आपके लिए ये खास पांच ट्रिक लेकर आए हैं, जिनकी मदद से आप व्हॉट्सएप का चालाकी से इस्तेमाल कर सकते हैं और उसकी खामियों का शिकार होने से बच सकते हैं. इन तरीकों के बारे में कम लोग जानते हैं. उम्मीद है ये आपके लिए भी मददगार होंगे.

1. लास्ट सीन छुपाने का चोर दरवाजा
आप कुछ लोगों के संदेश ऑफलाइन होकर पढ़ते हैं क्योंकि 'ब्लू टिक' का डर है. इस डर से छुटकारा पाने का एक तरीका है. एंड्रॉयड यूजर इसके लिए 'Hide status' नाम की एप्लीकेशन प्लेस्टोर से डाउनलोड करें. यह ऐप इंस्टॉल करने के बाद आप जब भी व्हॉट्सएप खोलेंगे, आपका वाईफाई और मोबाइल डाटा कनेक्शन अपने आप बंद हो जाएगा. आप जैसे ही व्हॉट्सएप से बाहर आएंगे आपका इंटरनेट दोबारा चलने लगेगा.

2. ग्रुप में कौन कर रहा इग्नोर
ब्लू टिक का कॉन्सेप्ट व्हॉट्सएप ग्रुप में नहीं आया है. अभी यहां सिर्फ सिंगल टिक का ही इंतजाम है. यानी ग्रुप में यह पता नहीं चल पाता कि आपका मैसेज कौन लोग पढ़ चुके हैं और इसके बावजूद इग्नोर कर रहे हैं. तो उसका तरीका व्हॉट्सएप में इनबिल्ट है, पर कम लोग इस बारे में जानते हैं. आप ग्रुप में भेजे गए अपने संदेश को उंगली से प्रेस करके रखें तो वह सलेक्ट हो जाएगा. इसके साथ ही ऊपर की तरफ एक आई बटन (i) दिखाई देगा. इस पर क्लिक कीजिए, आपको पता लग जाएगा कि ग्रुप के कौन से सदस्य आपका संदेश पढ़ चुके हैं और कौन नहीं. इग्नोर करने वालों को पहचानिए और फिर कीजिए टांग खिंचाई. वे भी चौंक जाएंगे.

3. व्हॉट्सएप की तस्वीरें गैलरी में न जाएं
व्हॉट्सएप पर लोग तमाम तरह की फोटोज भेजते हैं, जिनमें बहुत सारी डिलीट करने लायक होती हैं. कई बार उसमें प्राइवेट तस्वीरें भी होती हैं. अगर आप चाहें तो ऐसी व्यवस्था कर सकते हैं कि व्हॉट्सएप की तस्वीरें आपके गैलरी के फोल्डर में सेव न हों. एंड्रॉयड यूजर्स को इसके लिए एक व्हॉट्सएप इमेजेस (WhatsApp’s images) या व्हॉट्सएप वीडियो वाले फोल्डर में एक .nomedia फाइल बनानी होगी. इसके लिए आपको एक फाइल एक्सप्लोरर की जरूरत पड़ेगी, मसलन ES File Explorer. इसके अंदर आप इमेजेस या वीडियो के फोल्डर में जाएं. नीचे बाईं तरफ के new बटन पर क्लिक करें, फाइल सेलेक्ट करें और नई फाइल बनाएं, जिसका नाम रखें, .nomedia. इसके बाद व्हॉट्सएप की तस्वीरें आपकी गैलरी में सेव नहीं होंगी.

4. नंबर तो बंद है पर व्हॉट्सएप ऑन है
आप अपना व्हॉट्सएप नंबर किसी भी वक्त बदल सकते हैं. इसके लिए आपको व्हॉट्सएप को डिलीट करके फिर इंस्टॉल करने की जरूरत नहीं है. व्हॉट्सएप की 'सेटिंग' में जाएं. फिर 'अकाउंट' में और फिर 'चेंज नंबर' में. बस फिर नया नंबर डालकर वेरिफाई करें. याद रखें कि व्हॉट्सएप का नंबर सिर्फ डिस्प्ले का नंबर होता है. बल्कि आप व्हॉट्सएप के लिए एक 'स्विच्ड ऑफ' नंबर का इस्तेमाल भी कर सकते हैं. इस दौर में लड़कियों के लिए यह काम की ट्रिक है. व्हॉट्सएप को आप जिस नंबर से वेरिफाई करें, बाद में उस नंबर को बंद कर दें. एक बार वेरिफिकेशन के बाद व्हॉट्सएप यह नहीं देखता कि नंबर चालू है या नहीं. इसके बाद दूसरे नंबर से अपना नेट चलाएं और व्हॉट्सएप यूज करें. सबको आपका पुराना नंबर ही डिस्प्ले होगा. कोई उस पर कॉल करेगा तो फोन बंद आएगा. यह उन लड़कियों के लिए बेहद उपयोगी है जो वर्चुअल दुनिया के दोस्तों को इतनी जल्दी अपना नंबर नहीं देना चाहतीं, लेकिन व्हॉट्सएप पर बात करने से गुरेज नहीं रखतीं. कोई लड़का नंबर मांगे तो उसे वो स्विच्ड ऑफ वाला नंबर ही बताएं और कुछ दिनों की व्हॉट्सएप चैट से लिफाफे का मजमून भांप लें. 

5. कौन है आपका व्हॉट्सएप फ्रेंड
अगर आपकी आंकड़ों में रुचि है तो यह आपको पसंद आएगा. एक एप्लीकेशन है WhatStat. इसकी मदद से आप व्हॉट्सएप पर अपनी चैटिंग का पूरा हिसाब-किताब देख सकते हैं. मसलन,  यह कि आपके टॉप फ्रेंड्स या टॉप ग्रुप कौन सा है या दिन भर में आप किस वक्त व्हॉट्सएप पर सबसे ज्यादा एक्टिव रहते हैं या आपके कितने फीसदी मैसेज अभी डिलीवर होने से बाकी हैं, वगैरह वगैरह.

Saturday, 27 December 2014

हकीकत है जूदा जीवन.....

यहां उलझन में जीबन है,
वहां कांटो पे चलना है,
पडे है पांव मै छाले,
सफर तय फिरभी करना है.

उदासी का सबब तुमको,
बता दुं क्या मेरे यारों,
खडी उस पार है नौका,
मुझे उस पार जाना है.

कठिन है रास्ता लेकिन,
जरा सा हौसला रखना.
तुझे जज्बात रखना है,
मुझे औकात रखना है.

खुदा भी रूठ जाये तो,
फरिशतो साथ देना तुम.
घडी है इम्तिहानों की,
किसी सांचे में ढलना है.

वो पैरहन नहीं है अब,
बदन कैसे छुपाऊं में.
हया रोये अकेले में,
कहां सजना संवरना है.

किताबी ग्यान का कीडा,
लगा कर लोग बैठे है.
हकीकत है जुदा जीबन,
जहां जीना है मरना है.

Monday, 8 December 2014

कर्म प्रधान

नजरिया बदल कर देखो नजारे बदल जायेंगे.
आसमां का सफर करोगे तो सितारे बदल जायेंगे.
जमाना करेगा तरीफ उन्हीं लोगों की.
जिनके कर्मों से जमाने बदल जायेंगे.

कर्म प्रधान विश्व रच राखा, को कर तरक बढ़ावे शाखा.

वर्ण व्यवस्था कर्म पर आधारित थी पर आज हम कर्म क्या कर रहे हैं इससे हमारी जाति पर कोई फर्क नहीं पड़ता है? जाति प्रथा को जिंदा रखने के लिये ही आरक्षण का प्रादूर्भाव हूआ है. आज हम आरक्षण को खत्म करने की बात करते हैं तब हम ये क्यों नहीं सोचते कि जाति को ही खत्म कर दिया जाये. जड़ पर पानी देने से तो पेड़ बड़ा ही होगा. छटाई कब तक करोगे. जड़ ही काट दोगे तो पेड़ अपने आप समाप्त हो जायेगा. पहले हम जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद को खत्म करें फिर समाजवाद लायें उसके बाद विश्व बंधूत्व की बात करें.

Sunday, 7 December 2014

गैस त्रासदी मे मेरा हाल

मैं गैस त्रासदी के समय यूनियन कार्वाईड से १ कि.मी. दूर रहता था. वो एक वगीचा था जिसमें वहूत सारे पेड़ पौधे थे. बड़ा बाग के नाम से जाना जाता है उस जगह को. रात्री में सभी सो चूके थे. में उसी दिन गांव से आया था पापा के साथ. पापा मूझे यहां छोड़कर छिंदवाड़ा की बस पकड़कर रवाना हूये थे. रात को मीर्ची जलने की महक से खांसी चालू हूई तो रूकने का नाम ही नहीं ले रही थी. मैं पड़ोसी से लड़ रहा था यह समझकर कि उन्होंने सब्जी के तड़के में मिर्ची जला दी है. पर वो मूझपर ही आरोप मढ़ रहे थे. पर जब रोड पर लोगों के भागने की और चिल्लाने की आबाज आई "भागो भागो गैस निकल गई है, इस दौरान खांसी बंद होने का नाम नहीं ले रही थी. किसी ने कहा बाहर नहीं निकलो और कोई कह रहा था बाहर निकल कर भागो. मैं बाहर िनकला तो खांसी में राहत मिली सो मैं हमीदिया हास्पिटल की ओर चल दिया खांसते हूये चला जा रहा था सूबह के ०४.०० बजे थे अंधेरे में आबाजें आ रहीं थी लोग भाग रहे थे कूछ रोड पर निढाल होकर पड़े थे कूछ मदद के लिये हाथ बढा रहे थे पर सब अपनी जांन बचा कर भाग रहे थे. किसी तरह अस्पताल पहूंचे. वहां पर गैस का असर कम था क्योंकि अस्पताल ऊंचाई पर था. गैस भारी थी निचे की ओर भरा रही थी हबा से बजनी होने के कारण. किसी तरह सूबह होने पर प्राथमिक उपचार किया गया. पापा जैसै ही सूवह बस से छिंदवाड़ा उतरे खबर लगते ही बापस भोपाल के लिये बस में वैठ गये. आसंका से घिरे हूये कि पता नहीं क्या हूआ होगा. उस समय मोबाईल भी नहीं हूआ करते थे. कि खबर हो जाती. जब घर पर पहूंचे और सही सलामत देखा तो जान मैं जान आई.

पापा कहते हैं

पापा कहते हैें....
दूनियां बहूत खराब है..
सीधे स्कूल जाऔ और घर आऔ..
किसी से रास्ते में बात मत करना..
लड़कों से दूर रहना...

Thursday, 2 October 2014

खिड़कियां

ये पेड़ों के झुरमुट,
ये चिड़ियों का जमघट,
ये फूलों का खिलना,
दिखाती हैं खिड़कियाँ.

ये वाहनों का जाना,
दुकानों का खुलना,
पैदल भरी सड़क पर चलना
दिखाती हैं खिड़कियाँ.

कभी बादल घनेरे,
कभी बूंदों की रिमझिम,
कभी तारों की टिम टिम,
दिखाती हैं खिड़कियाँ.

सुबह सूरज के दर्शन,
रात्रि चंदा की जगमग,
पत्तों का झड़ना,
दिखाती हैं खिड़कियाँ .

दूर पहाड़ों के उन्नयन,
ये झीलों की लहरें,
वायुयानों की गर्जन,
दिखाती हैं खिड़कियाँ

जब हम हों घर में अकेले,
तन निर्बल और मन हो सशंकित,
बहार की दुनियां,
दिखाती हैं खिड़कियाँ .

ये हवा के झोंके,
ये पर्दे का हिलना,
हवा के रंगों को,
दिखाती हैं खिड़कियाँ


Wednesday, 17 September 2014

गुबार रह गया बाकी.....

दिल में बस इतना सा गुबार रह गया बाकी
प्यार दोनों ही तरफ था इजहार रह गया बाकी.......

मैंने चाहा था जो, वो सब दिया उसने,
फिर भी उसपर मेरा कुछ उधार रह गया बाकी.......

उसको पाने की तमन्ना थी, पाया भी
पर नजदीकियों का एक खुमार रह गया बाकी........

दिल में बस इतना सा गुबार रह गया बाकी
प्यार दोनों ही तरफ था इजहार रह गया बाकी.......

घर तोड़ दिया लोग लेगये ईंटें
अब तो उस जगह प्लाट रह गया बाकी......

खाली जगह देख करलोगों  ने बना दी धर्मशाला
आशियां बनाने का इंतजार रह गया बाकी........

दिल में बस इतना सा गुबार रह गया बाकी
प्यार दोनों ही तरफ था इजहार रह गया बाकी.......

दर्द छिपा सकते थे, छिपा लिया हमने
जो न छिप सका, वो बुखार रह गया बाकी.......

मेरे मुर्दे ने भी अपनी आंखें खुली रख्खी,
लगता है तेरा इन्तजार रह गया बाकी......

दिल में बस इतना सा गुबार रह गया बाकी
प्यार दोनों ही तरफ था इजहार रह गया बाकी.......

बूजूर्गों का रहमो करम पहले भी था आज भी है,
बस बच्चों द्वारा आदर सत्कार रह गया बाकी.......

बच्चों को तो हमने खूब पढ़ाया लिखाया,
बस देना था जो संस्कार रह गया बाकी......

दिल में बस इतना सा गुबार रह गया बाकी
प्यार दोनों ही तरफ था इजहार रह गया बाकी.......

बच्चों की पढ़ाई, बिटिया की शादी मैं ही जानता हूं कैसे की,
अब तो अंतिम संस्कार रह गया बाकी......

आपरेशन के दौरान किडनी चूरा ली,
क्या डॉक्टरों का यही व्यापार रह गया बाकी....

दिल में बस इतना सा गुबार रह गया बाकी
प्यार दोनों ही तरफ था इजहार रह गया बाकी.......

अस्पताल में बच्चा कैसे बदल गया,
अब क्या यही कारोवार रह गया बाकी....

बाप ने लूट ली बेटी की अस्मत,
अब न अपनों पर ऎतवार रह गया बाकी......

दिल में बस इतना सा गुबार रह गया बाकी
प्यार दोनों ही तरफ था इजहार रह गया बाकी.......

दिनेश दुबे
9229547354 


Tuesday, 15 July 2014

इस्क की इन्तेहां

तू सोख नजर के तीर चला, कि दिल का कीमा बन जाए.
कीमे से तू जा चींटी को चुगा, कि हुस्न तेरा न ढल जाए.